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प्रवाह के साथ प्रवाहमय

कठिन बदलना है सभी, कर लेना स्वीकार।
सीख बहना प्रवाह में, जीवन के दिन चार॥

आध्यात्मिकता के मार्ग पर चलने के लिए यह उपाय ज्यादा कारगर है। ज्ञान और भक्ति के मार्ग कर्म पर प्रबल होने लगते हैं। जेन दर्शन सिखाता है कि हमें अपनी जिन्दगी नदी की तरह जीना चाहिए। प्रवाह के साथ सतत प्रवाहित। इससे बाधाएं घटती हैं। जब आप प्रवाह के साथ प्रवाहित रहते हैं तो रुकावटें कमतर होती जाती हैं और जीवन सुकून तथा परम सुख की तरफ अग्रसर रहता है।

इस उपाय का मीनपक्ष यह है कि व्यक्ति सूखी लकड़ी की तरह हो जाता है, उत्साहहीन एवं प्रेरणा-विहीन। इससे व्यक्ति पूर्णतः निकम्मा और नाकारा हो सकता है। तब तक कि जब तक आकांक्षाएं और इच्छाएं समाप्त नहीं हो जाती, प्रवाह के साथ प्रवाहित हो पाना मुमकिन नहीं हो पाता बल्कि ख़ुशी से ज्यादा इससे दर्द ही हासिल होता है। हालाँकि आंशिक इस्तेमाल से यह उपाय कुछ समय के लिए कुछ भूमिकाओं में उपयोगी हो सकता है, खासकर तब कि जब लोगों एवं हालात से संघर्ष की बजाय उन्हें स्वीकारना ही बेहतर हो। वर्तमान समय में जब तकनीकी तेजी से बदल रही है और पीढ़ियों के बीच की दूरी घट रही है, अगर हम प्रवाह के साथ नहीं प्रवाहित होते हैं और लगातार शिकायती बने रहते हैं तो जीवन दुखदायी हो उठता है। बदलावों को स्वीकार करना और प्रवाह के साथ ही प्रवाहित होना बेहतर होता है.

प्रवाह के साथ प्रवाहित होने के पाँच उपाय
१.      उम्मीद किसी चीज की न कीजिए, सबकुछ स्वीकार कीजिए। लेकिन अपने प्रयत्नों में कोई कमा न आने दे।
२.      शिकायत न कीजिए।
३.      लोग कठिन नहीं होते हैं, बस अलग होते हैं, उन्हें समझने की कोशिश करते रहना चाहिए।
४.      दुःख एवं सुख से खुद को विरक्त रखने की कोशिश कीजिए।
५.      मनसा-वाचा-कर्मणा एकसम रहिए मतलब जो विचार कीजिए, वही बोलिए और वैसे ही आचरण कीजिए।

Hemant Lodha

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