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उम्मीदों का प्रबंधन

इच्छा समस्त उम्मीदों की जननी है. मनुष्य होने के नाते यह स्वाभाविक है कि परिवार, मित्रों और सहकर्मियों से उम्मीदें की जाएं। यह भी उतना ही स्वाभाविक है कि दूसरे भी हमसे उम्मीदें करेंगे। उम्मीदों को समाप्त करना बहुत कठिन है, इसलिए यह जरुरी है कि उम्मीदों के प्रबंधन के बारे में सीखा जाए। उम्मीदों के न रहने से कार्यस्थल में विकास की संभावना ही नहीं रहेगी। यहाँ सम्बंध मुख्यतः आदान-प्रदान के सिद्धांतों पर निर्भर रहते हैं। आप बॉस हैं तो अपने मातहत काम करने वालों की क्षमताओं को ध्यान में रखते हुए जितनी चाहें उम्मीदें लगा सकते हैं। यदि आपकी उम्मीद और उपलब्धियों में अंतर है तो या तो कौशल का स्तर बढ़ा दें या फिर उम्मीदें ही घटा दें।

निजी स्तर पर अर्पण और त्याग ही सम्बंध का आधार होते हैं। दूसरों के लाभ के बारे में सोचते हुए उम्मीद करने की बात समझ में आती है लेकिन अपने लाभ के लिए उम्मीद करने से तकलीफ पैदा होती है अगर दूसरे आपकी उम्मीदें पूरी करने में असफल हुए तो। सुकून और प्रसन्नता बनाए रखने का सर्वश्रेष्ठ तरीका है कि हम कम से कमतर उम्मीद करें।

उम्मीदों के प्रबंधन के पाँच उपाय
1.       निजी और व्यावसायिक उम्मीदों का प्रबंधन अलग-अलग करें।
2.       क्षमताओं पर निर्भर वास्तविकता एवं उम्मीदों के बीच का अंतर घटाएं।
3.       सम्बंध बचाने के लिए उम्मीदें छोड़ दें।
4.       अपना दायित्व निभाते रहें।
5.       खुशी देने वाली उम्मीद ही बढ़ाएं, दुखदायी उम्मीद तुरंत छोड़ देनी चाहिए।

Hemant Lodha

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