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सहानुभूतिपूर्वक सुनना

अनुसंधानों से ज्ञात हुआ है कि हम शब्दों के जरिए सिर्फ 30-35 प्रतिशत ही अभिव्यक्त कर सकते हैं, शेष अभिव्यक्ति हमारी भाव-भंगिमा से होती है। विद्यालय हमें लिखने-पढ़ने का सलीका सिखाते हैं, लेकिन शायद ही किसी विद्यालय में सुनने का सलीका सिखाया जाता हो। सुनना एक हुनर है और समुचित प्रशिक्षण तथा सचेत शिक्षा से इसे हासिल किया जा सकता है।

सुनने के कई स्तर हैं जिसमें नहीं सुनने से सहानुभूतिपूर्वक सुनने तक की स्थितियां हैं। समूह में आप उस व्यक्ति को आसानी से ढूँढ़ सकते हैं जो अपने मोबाइल पर लगा हुआ है और वक्ता की सुन ही नहीं रहा है। अगले स्तर पर वे लोग हैं जो वक्ता की तरफ देखते तो हैं लेकिन सोच कुछ और ही रहे होते हैं। असल में वे कुछ भी सुन ही नहीं रहे होते हैं. एक और स्तर हैं, जहाँ व्यक्ति एकाग्र दिखाई तो देता है मगर असल में वह अपने क्रम का इंतजार करते हुए वक्तव्य की तैयारी कर रहा होता है। अगले चरण में व्यक्ति ध्यानपूर्वक सुन रहा है मगर वक्ता की भाव-भंगिमा पर गौर नहीं करता। सहानुभूतिपूर्वक सुनने में आप अपनी समस्त इन्द्रियों से पूरे तन्मय होकर सुनते हैं, वक्ता की भाव-भंगिमा पर गौर करते हैं, जैसे कि उसकी आत्मा में प्रवेश कर गए हों। इस स्तर पर आपको यह भी सुनाई देने लगता है कि दूसरे क्या सोच रहे हैं।

सहानुभूतिपूर्वक सुनने के पाँच उपाय
1.       वक्ता से एकात्म होकर सुनना चाहिए।
2.       अपरिहार्य होने पर ही बोलना चाहिए।
3.       दिमाग को भटकाव से बचाना चाहिए।
4.       एकाग्र होने के लिए सतत सचेत प्रयास की जरुरत होती है।
5.       कुछ छूट जाए तो निसंकोच पूछ लिया जाना चाहिए।

Hemant Lodha

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