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प्रतिदान ही हो जीवन 

तीन अन्य सहोदर भाई-बहनों के साथ एक सम्मानित किन्तु सीमित संसाधनों वाले जैन परिवार में मेरा लालन-पालन हुआ। हालाँकि संसाधनों के आभाव के बावजूद बालपन से मैं देखता था कि मेरी माँ रोटियाँ बनाते समय सड़क के पशुओं के लिए भी अतिरिक्त रोटियाँ बनाया करती। उनको ऐसा करते देख मैंने किसी भी परिस्थिति में जरुरतमंदों की सहायता का पाठ सीखा।

हम में से अनेक जनों के भीतर यह विचार होता है या यह भावना होती है कि हमें समाज से जो भी मिला है उसका प्रतिदन करना चाहिए लेकिन हमें ज्ञात नहीं होता कि यह किया कैसे जाए ताकि हमारे प्रयासों और संसाधनों का समुचित तरीके से इस्तेमाल हो। पारिस्थितिकी तंत्र से किसी एक क्षेत्र का चयन करना चाहिए और फिर उस क्षेत्र में अनंत सकारात्मक बदलाव लाने की कोशिश करनी चाहिए। सहायता और सेवा अपनी खुशी के इरादे से विस्तृत की जानी चाहिए। अहंकार की जगह आनंद और कृपा की जगह करुणा का हमारे भीतर वास हो. प्रतिदान की आदत को बढ़ावा देना जरुरी है. जैसे भी संभव हो, जहाँ भी संभव हो।

प्रभावी प्रतिदान के पाँच उपाय

1.       आपकी आय चाहे जो हो, एक छोटा हिस्सा जरुरतमंदों की मदद के लिए होना चाहिए।
2.       प्रतिदान कृपापूर्वक नहीं सिर्फ प्रेमपूर्वक हो।
3.       प्राप्तकर्ता की भावनाओं का ख्याल रखें।
4.       अपने प्रतिदान को जग-जाहिर न करें।
5.       अपने करीबी जनों और कर्मचारीवृन्द का विशेष ख्याल करें।

Hemant Lodha

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