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लचीलेपन से स्वीकार्यता बने

भाव लचीला जो रखे, करते सब स्वीकार।
आप अकड़ के जब चले, करे न कोई प्यार॥

लोहा, सोना या चाँदी हो हम किसी भी धातु को तभी आकार दे पाते हैं जब पहले उसे लचीला बना लेते हैं। आकार देने के बाद उसका लचीलापन समाप्त कर दिया जाता है। फिर कभी कोई आकार देना हो तो पहले उसे तोड़ते हैं, गलाते हैं और मनचाहे आकार देते हैं। कल्पना कीजिए कि यदि हमारे शरीर में समुचित जोड़ और लचीलापन न हो तो एक दिन भी जीवित रहना मुश्किल हो जाए। मृत्यु होते ही हमारा शरीर अकड़ जाता है और फिर उसे जलाने-दफनाने के अलावा हमारे पास कोई विकल्प नहीं रहता।

यदि जीवन में हम अपने व्यवहार और मिज़ाज को लचीला नहीं बनाएंगे तो अपने परिवार, मित्रों, कार्य अथवा समाज में हम स्वीकार्य नहीं होंगे। बिना औरों के पहलू पर गौर किए यदि हम अपने विचार और मंतव्य पर अड़े रहेंगे तो लोगबाग हमसे दूरी बनाने लगेंगे। इसका यह मतलब नहीं कि हम रीढ़हीन हो जाएँ। हमारी अपनी दृढ़ धारणाएं होनी ही चाहिए लेकिन दूसरों की मान्यताओं का निरादर भी हमें नहीं करना चाहिए। कई बार हालात तभी बिगड़ते हैं जब हम दृढ़तापूर्वक खुद को सही और दूसरे को बेतुका मानने लगते हैं। ऐसे परिदृश्य में बेहतर यही होता है कि खुद को दूसरों की जगह रखते हुए हमें उनके पहलू से बात को समझने की कोशिश करनी चाहिए।

मिज़ाज को लचीला बनाने के पाँच उपाय
१.      अपने मिज़ाज को ‘मैं सही हूँ, आप गलत है’ वाला बनाने की बजाय ‘मैं अपनी जगह सही हूँ, आप अपनी जगह सही हैं’ वाला बनाइए।
२.      पहले सुनना चाहिए. दूसरों के प्रति समान दृष्टि रखने से आप लचीले और स्वीकार्य बनते हैं।
३.      व्यक्तित्व की विविधता का सम्मान करना चाहिए।
४.      गैर-महत्वपूर्ण मसलों को रफा-दफा करना चाहिए।
५.      दृढ़ धारणाओं के बनिस्बत सम्बंध अधिक मायने रखते हैं।

Hemant Lodha

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