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ईर्ष्या नफ़रत का बीज है

ईर्ष्या से नफ़रत बढ़े, खुद पर देना ध्यान।
प्रतिस्पर्धा अच्छी रहे, प्रतिद्वंदि खुद मान॥

ईर्ष्या हमेशा न सही पर अक्सर नफरत का रुप ले लेती है. हम जिससे ईर्ष्या करते हैं अक्सर उसके प्रति दुर्भावना दिखाने लगते हैं. सतही तौर पर ईर्ष्या दो तरह से हमारे भाव रचती है. हमारा मिजाज़ यदि सकारात्मक है तब हम इर्षित व्यक्ति से अधिक उपलब्धियां हासिल करने के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित होते हैं. परन्तु, मिजाज़ यदि नकारात्मक हुआ तो हम स्पर्धा से खुद को खींचकर अपने भीतर उस व्यक्ति के लिए नफरत रचने लगते हैं.

ईर्ष्या या द्वेष के भाव को उभरने न देना ही सर्वोत्तम सोच है. फिर भी हालात हमें ईर्ष्या के लिए बाध्य कर सकते हैं, खासकर जीवन के आरंभिक दिनों में जब माता-पिता अनजाने में ही भाई-बहनों से हमारी तुलना करते हुए शिक्षा और खेल में हमारे अग्रणी होने की उम्मीद लगा बैठते हैं. हमारी अभिभावकीय वृत्ति और शिक्षा व्यवस्था सामूहिकता की भावना विकसित करने में नाकामयाब है. समस्त मान्यताएं और अनुभव एक सफल व्यक्तित्व बनने की राह में रोड़ा हैं. आज के औद्योगिकीकरण, शहरीकरण और विविध भौतिक वस्तुओं के विज्ञानसम्मत नवाचार से द्वेष की भावना विकसित होने की संभावनाएं प्रबल हुयी हैं. लेकिन, हमें इन संभावनाओं को आत्मविकास की दिशा में साकार करना चाहिए.

 

ईर्ष्या की भावना से उबरने के पांच उपाय

१.      दूसरों की उपलब्धियों को दिल से सराहें.

२.      खुद के प्रति सकारात्मक रहें.

३.      हीन भावना को भीतर फटकने न दें.

४.      खुद से स्पर्धा करें.

५.  खूब उत्साह से सक्रिय होकर अधिकाधिक उचाइयां हासिल करें.

 

Hemant Lodha

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