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अतिथि ईश्वर समान

अतिथि का सम्मान करे, अतिथि ईश्वर मान।
आप हो मेहमान तो, निभे धर्म मेहमान॥

भारत उन कई देशों में शामिल है, जहाँ अतिथि को ईश्वर मानने की संस्कृति एवं परम्परा है। अतिथि देवो भवः का अर्थ ही होता है कि अतिथि ईश्वर समान है। भारत के पर्यटन मंत्रालय ने इसे अपना घोष वाक्य बना लिया है और इसी ध्येय के दायरे में पर्यटन का प्रचार करते हैं।

हालाँकि समय के साथ, शहरों की उत्तेजक जिन्दगी और भौतिकतावाद के संवर्धन के चलते अतिथियों के मान-सम्मान में विचारणीय कमी आयी है। आजकल, ज्यादातर घरों में अतिथि को बोझ समझा जाता है। वहीं जब हम किसी के घर मेहमान बनकर जाते हैं हम मेहमान होने के साधारण शिष्टाचार भी नहीं निभाते हैं। बदलते वक़्त के साथ अब सारा ध्यान बजाय इसके कि मैं दूसरों के लिए क्या कर सकता हूँ, इस बात पर केन्द्रित रहता है कि दूसरे मेरे लिए क्या कर सकते हैं। हम अवसरवादी हो गए हैं इसलिए जो लोग हमारे लिए उपयोगी होते हैं, हम उनके साथ भला व्यवहार करते हैं और जो अनुपयोगी हैं, वे जब हमारे घर आते हैं, हमें बोझ की तरह लगते हैं. वर्तमान समय में अतिथियों को भगवान मानना शायद संभव न हो, लेकिन उनके साथ कम से कम मनुष्यों जैसा व्यवहार कर हम अपनी मनुष्यता तो बचा ही सकते हैं।

आतिथ्य के पाँच उपाय
१.      अनचाहे और सच्चे मेहमान के बीच फर्क अपने विवेक से कीजिए।
२.      सच्चे मेहमानों की आवभगत गर्मजोशी से कीजिए।
३.      यदि आपके काम का वक़्त उनके आगमन के वक़्त से टकराता है तो आपको यह सद्प्रयास करने चाहिए कि आपके यहाँ वे समुचित अपनत्व महसूस करें और यह समझ पाएं कि आप उनकी सुविधा की बेहतरीन व्यवस्था कर रहे हैं।
४.      यदि कोई मेहमान आपकी खातिरदारी का गलत फायदा उठा रहा है तो अडिग लेकिन विनम्र बने रहिए।
५.      यदि मेहमान कोई करीबी पारिवारिक सदस्य या मित्र न हो तो उसके सामने अपनी निजी समस्याओं की चर्चा हरगिज न कीजिए।

Hemant Lodha

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