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Ashtavakra Mahageeta

The Ashtavakra MahaGeeta  “अष्टावक्र महागीता” or the Song of Ashtavakra is a classical Advaita Vedanta scripture. It is written as a dialogue between the sage Ashtavakra and Janaka, king of Mithila and father of Sita.

Dohe written by CA Hemant C. Lodha and edited by Shri Avinash Bagde.
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Ashtavakra Mahageeta

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अष्टावक्र महागीता 1

जनक उवाच

कथं   ज्ञानमवाप्नोति,   कथं  मुक्तिर्भविष्यति।
वैराग्य च  कथं  प्राप्तमेतद, ब्रूहि  मम  प्रभो ॥

कैसे  पाऊँ  मुक्ति  मैं,   कैसे   पाऊँ  ज्ञान ।
कैसे   वैरागी   बनूँ,    बतलाओ   भगवान॥1-1॥

अष्टावक्र उवाच

मुक्तिमिच्छसि   चेत्तात्,  विषयान  विषवत्त्यज।
क्षमार्जवदयातोष,       सत्यं     पीयूषवद्भज॥

चाह मुक्ति की हो अगर, विष विषयक ना चाह।
दया, क्षमा, संतोष सत्,  सरल ये अमृत राह॥1-2॥

न पृथ्वी  न जलं नाग्निर्न, वायुर्द्यौर्न वा भवान् ।
एषां  साक्षिणमात्मानं,  चिद्रूपं  विद्धि  मुक्तये॥

धरती  जल ना आग है, पवन न तू आकाश।
चेतन  साक्षी  आत्मा,  तू  है  मुक्त  प्रकाश॥1-3॥

यदि देहं पृथक् कृत्य, चिति विश्राम्य  तिष्ठसि ।
अधुनैव  सुखी  शान्तो,  बन्धमुक्तो  भविष्यसि॥

अलग  करे  तू  देह  जो,  चेतन को आराम।
सुख और शांति झट मिले, मिले मुक्ति का  धाम॥1-4॥

न त्वं  विप्रादिको  वर्ण:,नाश्रमी   नाक्षगोचर: ।
असङगोऽसि  निराकारो, विश्वसाक्षी सुखी भव॥

वर्ण  आश्रम  तू  नहीं,  कोई  सके  न  देख।
निराकार संगी  रहित,  साक्षी  भाव  से देख॥1-5॥

धर्माधर्मौ  सुखं  दुखं,  मानसानि  न ते विभो ।
न  कर्तासि न भोक्तासि, मुक्त  एवासि  सर्वदा॥

धर्म-अधर्म,  सुख-दु:ख सदा,  मन से जुड़े न  जान।
ना  तू  भोगे  ना  करे,  मुक्त  सदा तू मान॥1-6॥

एको  द्रष्टासि  सर्वस्य,  मुक्तप्रायोऽसि  सर्वदा।
अयमेव  हि  ते  बन्धो,  द्रष्टारं  पश्यसीतरम्॥

सकल  जगत के हो द्रष्टा, सदा मुक्त हो आप।
किन्तु  अन्य  को  देख के, बंधन समझे आप॥1-7॥

अहं      कर्तेत्यहंमान,    महाकृष्णाहिदंशित: ।
नाहं  कर्तेति  विश्वासामृतं,  पीत्वा  सुखं  भव॥

जो ख्ाुद  को  कर्ता  कहे,  महासर्प फुफकार।
नहीं जो कर्ता जानता,  अमृत-सुख  का  द्वार॥1-8॥

एको   विशुद्धबोधोऽहं,   इति   निश्चयवह्निना।
प्रज्वाल्याज्ञानगहनं,   वीतशोक:   सुखी   भव॥

मैं  ही  ज्ञान विशुद्ध हूँ,  निश्चित जब ले जान।
जलता वन अज्ञान का,  शोकरहित सुख मान॥1-9॥

यत्र   विश्वमिदं  भाति,  कल्पितं   रज्जुसर्पवत् ।
आनंदपरमानन्द:  स,  बोधस्त्वं   सुखं   चर ॥

रस्सी  लगती  सर्प सी, जग  ये  माया  जान।
अनुभव परमानन्द करे, उसको ही सुख  मान॥1-10॥

मुक्ताभिमानी  मुक्तो हि,  बद्धो बद्धाभिमान्यपि।
किवदन्तीह  सत्येयं, या  मति: सा  गतिर्भवेत्॥

अहं मुक्त ही मुक्त है,  बद्ध  सोच  बंध  जाय।
यही  कहावत  सत्य है, मति जैसी  गति पाय ॥1-11॥

आत्मा साक्षी विभु:, पूर्ण एको  मुक्तश्चिदक्रिय:।
असंगो  नि:स्पृह:  शान्तो,  भ्रमात्संसारवानिव॥

साक्षी आत्मा सब जगह, पूर्ण, सजीव, निष्काम।
मुक्त, शांत, इच्छारहित, लौकिक भ्रमित  तमाम॥1-12॥

कूटस्थं     बोधमद्वैत – मात्मानं   परिभावय।
आभासोऽहं भ्रमं मुक्त्वा, भावं बाह्यमथान्तरम् ॥

तटस्थ, चेतन,  एक है,  आत्मिक चिंतन भाव।
मैं  के भ्रम से  मुक्त रहे, बाह्य  जगत स्वभाव॥1-13॥

देहाभिमानपाशेन   चिरं,   बद्धोऽसि   पुत्रक।
बोधोऽहं  ज्ञानखंगेन,  तन्निष्कृत्य  सुखी  भव॥

देह-दर्प  चिरकाल से,  पुत्र  ये  बंधन  जान।
काट  ज्ञान  की  धार से, सुख है इसमें मान॥1-14॥

नि:संगो निष्क्रियोऽसि, त्वं स्वप्रकाशो निरंजन:।
अयमेव  हि  ते   बन्ध:,   समाधिमनुतिष्ठति॥

निष्क्रिय और नि:संग तुम, स्थिर प्रकाश निर्दोष।
करे  ध्यान  मन  शांत ये,  है बंधन का दोष॥1-15॥

त्वया  व्याप्तमिदं  विश्वं,  त्वयि  प्रोतं यथार्थत:।
शुद्धबुद्धस्वरुपस्त्वं  मा,   गम:   क्षुद्रचित्तताम्॥

विश्व  यह  तुमने  रचा,  तुम ही  इसके नाथ।
ज्ञान-रूप  तुम  शुद्ध  भी, हीन भाव ना साथ॥1-16॥

निरपेक्षो  निर्विकारो,   निर्भर:   शीतलाशय:।
अगाधबुद्धिरक्षुब्धो     भव,    चिन्मात्रवासन:॥

विचारहीन,  इच्छारहित,  ठोस व शीतल भाव।
बुद्धिमान  तुम हो  बहुत, चेतन, शांत स्वभाव॥1-17॥

साकारमनृतं  विद्धि,  निराकारं   तु   निश्चलं।
एतत्तत्त्वोपदेशेन,       न      पुनर्भवसंभव:॥

मिथ्या  हर  आकार  है,  निराकार को मान।
तत्व  यही  तू  जान  ले, पुनर्जन्म  नहीं जान॥1-18॥

यथैवादर्शमध्यस्थे,   रूपेऽन्त:   परितस्तु   स:।
तथैवाऽस्मिन्  शरीरेऽन्त:,  परित:   परमेश्वर:॥

बसे  रूप दर्पण  में  ज्यूँ,  बाहर  रहे  समान।
वैसे  अंतर  ईश  बसे,  बाहर  भी  भगवान॥1-19॥

एकं    सर्वगतं   व्योम,   बहिरन्तर्यथा   घटे।
नित्यं   निरन्तरं   ब्रह्म,   सर्वभूतगणे   तथा॥

घट के अंदर बाह्य भी, इक सा  ही  आकाश।
वैसे  ही  परमात्मा,  सब   में  करता  वास॥1-20॥

अष्टावक्र महागीता 2

जनक उवाच

अहो  निरंजन: शान्तो, बोधोऽहं  प्रकृते: पर:।
एतावंतमहं    कालं,     मोहेनैव   विडम्बित:॥

ओह! निष्कलंक, शांत मैं, प्रकृति  परे सुजान।
भ्रम  में मैं अब  तक रहा, पड़े  मोह में प्राण ॥2-1॥

यथा   प्रकाशयाम्येको,  देहमेनो  तथा  जगत् ।
अतो  मम   जगत्सर्वमथवा  न   च   किंचन॥

यूँ  मैं  रोशन  तन करूँ, जग भी रोशन होय ।
पूर्ण जगत या मैं बसूँ,  या  फिर जग ना होय ॥2-2॥

सशरीरमहो   विश्वं,   परित्यज्य   मयाऽधुना।
कुतश्चित्  कौशलादेव,  परमात्मा   विलोक्यते॥

तनसहित  मै  त्याग  दूँ,  यह  सारा  संसार ।
कौशल  कुछ  ऐसा  मिले, खुले प्रभु का द्वार ॥2-3॥

यथा न  तोयतो भिन्नास्-तरंगा:  फेन बुदबुदा:।
आत्मनो  न तथा  भिन्नं   विश्वमात्मविनिर्गतम् ॥

अलग नहीं  जल  लहर से,  बुल्ला फेन समान।
अलग  आत्मा भी नहीं,  जगत  एक ही मान ॥2-4॥

तंतुमात्रो   भवेदेव,    पटो     यद्वद्विचारित:।
आत्मतन्मात्रमेवेदं,    तद्वद्विश्वं     विचारितम् ॥

वस्त्र  देखिये  ग़ौर  से,  धागों  का  है  जाल।
आत्माओं का जाल ही, सकल जगत का हाल॥2-5॥

यथैवेक्षुरसे  क्लृप्ता,  तेन   व्याप्तैव   शर्करा ।
तथा विश्वं मयि क्लृप्तं, मया व्याप्तं निरन्तरम्॥

रस  गन्ने  का  रूप  हैं,  चीनी  भी रस-रूप ।
वैसे  जग  मुझसे  बना, मैं  ही जगत-स्वरूप ॥2-6॥

आत्माऽज्ञानाज्जगद्भाति,  आत्मज्ञानान्न   भासते।
रज्जवज्ञानादहिर्भाति,    तज्ज्ञानाद्भासते  न  हि॥

आत्म लगे जग, ज्ञान बिन, रहे न जग, हो ज्ञान।
रस्सी लगती सर्प सी, सर्प  लुप्त,  जब  ध्यान॥2-7॥

प्रकाशो  मे  निजं रूपं, नातिरिक्तोऽस्म्यहं तत:।
यदा  प्रकाशते  विश्वं,  तदाऽहंभास  एव  हि॥

मेरा  रूप   प्रकाश  है,  नहीं  परे   पहचान।
ज्यूँ  प्रकाशित  जग  करे,  मैं की भी पहचान॥2-8॥

अहो   विकल्पितं,   विश्वंज्ञानान्मयि   भासते।
रूप्यं  शुक्तौ  फणी  रज्जौ, वारि सूर्यकरे यथा॥

कल्पित  जग मुझ में दिखे,  कारण है अज्ञान।
सर्प-सीप रस्सी रजत,  सूर्य  किरण जल भान ॥2-9॥

मत्तो   विनिर्गतं   विश्वं,   मय्येव  लयमेष्यति।
मृदि  कुम्भो  जले वीचि:,  कनके कटकं यथा॥

मुझसे  ही  है  जग  बना, मुझमें होय विलीन।
घट माटी, जल में  लहर, कड़ा कनक में लीन ॥2-10॥

अहो  अहं नमो मह्यं, विनाशो यस्य नास्ति मे।
ब्रह्मादिस्तंबपर्यन्तं,    जगन्नाशोऽपि    तिष्ठत:॥

अचरज है!  ख़ुद को नमन, जीऊँ  विश्व –  विनाश।
मिट जाये  तृण ब्रह्म सब, मगर  रहूँ आकाश॥2-11॥

अहो  अहं  नमो  मह्यं,  एकोऽहं  देहवानपि ।
क्वचिन्न गन्ता  नागन्ता,  व्याप्य  विश्वमवस्थित:॥

अचरज  है!  मुझको  नमन,  हूँ  मैं  ही  सशरीर।
आवे-जावे  जो  नहीं,   फैला  जग   तस्वीर ॥2-12॥

अहो  अहं  नमो  मह्यं, दक्षो नास्तीह मत्सम:।
असंस्पृश्य  शरीरेण,  येन  विश्वं  चिरं  धृतम्॥

अति आश्चर्य! नमन मुझे,  कुशल अनोखा जान।
बिना स्पर्श इस देह के,  जग धारण को मान ॥2-13॥

अहो  अहं  नमो मह्यं,  यस्य मे नास्ति किंचन।

अथवा  यस्य  मे  सर्वं   यद्  वाङ्मनसगोचरम्॥

अचरज है! मुझको नमन, जो कुछ रखे न पास।
या मन-वाणी  से समझ,  उसका है  आभास ॥2-14॥

ज्ञानं ज्ञेयं  तथा  ज्ञात्ता,  त्रितयं नास्ति वास्तवं।
अज्ञानाद्  भाति  यत्रेदं,  सोऽहमस्मि निरंजन:॥

ज्ञान,  ज्ञेय  ज्ञाता  नहीं,  सत्य न तीनों मान।
यह  केवल  अज्ञानता,  शुद्ध  रूप  मैं  जान ॥2-15॥

द्वैतमूलमहो   दु:खं   नान्य-त्तस्याऽस्ति  भेषजं।
दृश्यमेतन्  मृषा  सर्वं,   एकोऽहं  चिद्रसोमल: ॥

द्वैत  दुखों  का  मूल  है,  ना इसका उपचार।
जो  दिखता  वो भ्ाूल  है, चेतन  निर्मल सार।2-16॥

बोधमात्रोऽहमज्ञानाद्,  उपाधि:  कल्पितो मया ।
एवं  विमृशतो  नित्यं,  निर्विकल्पे   स्थितिर्मम॥

इक में ज्ञान  स्वरुप हूँ,  गोचर   हूँ  अज्ञान ।
नित  मेरा  अस्तित्व  है, कारणरहित  सुजान ॥2-17॥

न मे बन्धोऽस्ति मोक्षो वा  भ्रान्ति: शान्तो निराश्रया ।
अहो मयि स्थितं विश्वं वस्तुतो  न मयि स्थितम्  ॥

भ्रम ना बंधन-मुक्ति का,  शांत  निराश्रय जान।
जगत नहीं  मन में बसा, यही वास्तविक मान ॥2-18॥

सशरीरमिदं  विश्वं   न  किंचिदिति   निश्चितं।
शुद्धचिन्मात्र आत्मा च तत्कस्मिन्  कल्पनाधुना ॥

साथ देह के जगत भी,  अस्तित्वहीन  पहचान ।
शुद्ध ये चेतन  आत्मा,  है  सब  शेष  गुमान ॥2-19॥

शरीरं  स्वर्गनरकौ   बन्धमोक्षौ   भयं   तथा ।
कल्पनामात्रमेवैतत्  किं  मे  कार्यं  चिदात्मन:॥

स्वर्ग-नर्क ये देह सब,  बंध  मोक्ष  भय  नाम ।
बात कल्पना की सभी,  क्या  चेतन का काम ॥2-20॥

अहो  जनसमूहेऽपि  न   द्वैतं  पश्यतो   मम।
अरण्यमिव   संवृत्तं  क्व   रतिं   करवाण्यहम् ॥

देखूँ जब मैं  भीड़ को,  अचरज  दिखे न द्वैत ।
जैसे  निर्जन  सब  लगे,   मोह  नहीं  अद्वैत॥2-21॥

नाहं  देहो न  मे देहो  जीवो नाहमहं हि चित् ।
अयमेव  हि मे  बन्ध आसीद्या  जीविते  स्पृहा॥

नहीं  देह ना  देह  का,  जीव न मगर  सचेत।
मन में इच्छा  जीव  की,   बंधन  यही  संकेत॥2-22॥

अहो   भुवनकल्लोलै – विचित्रैर्द्राक्   समुत्थितं।
मय्यनंतमहांभोधौ      चित्तवाते      समुद्यते॥

महा सिंध्ाु मन का जहाँ, उठती  लहर  हज़ार।
पूर्ण जगत हिलडुल करे, मन विचलित हर बार ॥2-23॥

मय्यनंतमहांभोधौ     चित्तवाते     प्रशाम्यति।
अभाग्याज्जीववणिजो    जगत्पोतो    विनश्वर:॥

महा-सिंधु  मन में उठे,  जो  थम जाय विचार।
जीव   स्वरूप  जहाज़  का,  बेड़ा  होता पार ॥2-24॥

मय्यनन्तमहांभोधा  –  वाश्चर्यं      जीववीचय:।
उद्यन्ति  घ्नन्ति  खेलन्ति  प्रविशन्ति  स्वभावत:॥

ओह  महासागर  अनन्त, मन मम् उठते भाव ।
अंतस  में रमते  मिले,  जाकर  बने  स्वभाव॥2-25॥

अष्टावक्र महागीता 3

अष्टावक्र उवाच

अविनाशिनमात्मानं   एकं   विज्ञाय   तत्त्वत:।
तवात्मज्ञानस्य   धीरस्य   कथमर्थार्जने   रति:॥

इक  अविनाशी  आत्मा,  जानो  ऐसा  ज्ञान।
बुद्धिमान  यह जान ले,  धन अर्जन नहीं शान ॥3-1॥

आत्माज्ञानादहो      प्रीतिर्विषय    भ्रमगोचरे ।
शुक्तेरज्ञानतो    लोभो    यथा   रजतविभ्रमे ॥

सदा आत्म अज्ञान अरू, भ्रम से विषय लगाव ।
सीप  कभी  चाँदी  लगे,  लोभ  जगावे  भाव ॥3-2॥

विश्वं   स्फुरति   यत्रेदं  तरङ्गा  इव   सागरे ।
सोऽहमस्मीति विज्ञाय  किं दीन  इव   धावसि ॥

उद्भव होता है  जगत,  सागर  लहर  उफान।
मैं  ही हूँ यह  जानकर, भाग  न दीन समान ॥3-3॥

श्रुत्वापि     शुद्धचैतन्य     आत्मानमतिसुन्दरं ।
उपस्थेऽत्यन्तसंसक्तो       मालिन्यमधिगच्छति॥

शुद्ध  है चेतन  आत्मा,  सुंदर  है  सब जान ।
फिर क्यों  आसक्ति  तले,  दूषित करते प्राण ॥3-4॥

सर्वभूतेषु    चात्मानं   सर्वभूतानि   चात्मनि ।
मुनेर्जानत        आश्चर्यं      ममत्वमनुवर्तते॥

जीव  सभी  मुझमें  बसे,  बसता मैं हर जीव ।
अचरज मुनि यह जानता, फिर भी मोह की नींव॥3-5॥

आस्थित:  परमाद्वैतं  मोक्षार्थेऽपि   व्यवस्थित:।
आश्चर्यं   कामवशगो   विकल:  केलिशिक्षया ॥

आश्रय चाहे  ब्रह्म का,  जिसे मोक्ष  का ज्ञान ।
विषय  वासना  से गिरे,  अचरज इसको मान ॥3-6॥

उद्भूतं      ज्ञानदुर्मित्रम   –   वधार्यातिदुर्बल:।
आश्चर्यं    काममाकाङ्क्षेत्    कालमन्तमनुश्रित:॥

ज्ञान-शत्रु  का  हो उदय, अंत  समय आघात ।
कामवासना  मन  रखे,  यह अचरज की बात ॥3-7॥

इहामुत्र      विरक्तस्य    नित्यानित्यविवेकिन:।
आश्चर्यं  मोक्षकामस्य मोक्षाद्  एव  विभीषिका॥

भाव मुक्ति है जगत से,  नित्य- अनित्य का ज्ञान।
चाह मोक्ष की है प्रबल, अचरज डर का भान  ॥3-8॥

धीरस्तु  भोज्यमानोऽपि  पीड्यमानोऽपि सर्वदा ।
आत्मानं  केवलं  पश्यन्  न तुष्यति न कुप्यति॥

भोजन  या  पीड़ा मिले,  बुद्धिमान  सम भाव ।
ना ख़ुश हो ना हो दुखी,  आत्म दरश  का चाव॥3-9॥

चेष्टमानं   शरीरं   स्वं    पश्यत्यन्यशरीरवत्।
संस्तवे  चापि  निन्दायां  कथं क्षुभ्येत् महाशय:॥

कार्यशील  निज  देह  है,  दूजी  देह  समान ।
निंदा  हो  आभार  हो, विचलित करे न जान ॥3-10॥

मायामात्रमिदं   विश्वं   पश्यन्   विगतकौतुक:।
अपि  सन्निहिते  मृत्यौ  कथं  त्रस्यति  धीरधी:॥

जिज्ञासाओं  के  बिना,  जग   मायावी  जान ।
मौत खड़ी पर डर नहीं,  स्थिर  बुद्धि  पहचान ॥3-11॥

नि:स्पृहं  मानसं  यस्य  नैराश्येऽपि  महात्मन:।
तस्यात्मज्ञानतृप्तस्य   तुलना   केन    जायते॥

है  निराश,  इच्छा रहित, महा   आत्मा जान ।
ज्ञान  प्रकाशित तृप्त भी,  तुलना  नहीं सुजान॥3-12॥

स्वभावाद्  एव  जानानो  दृश्यमेतन्न   किंचन।
इदं ग्राह्यमिदं त्याज्यं  स किं  पश्यति  धीरधी:॥

दृश्य  जगत को  जानिये,  ऐसा  रहे  स्वभाव।
ग्रहण  करे या त्याग दे,  क्या है धीर  प्रभाव ॥3-13॥

अंतस्त्यक्तकषायस्य    निर्द्वन्द्वस्य    निराशिष:।
यदृच्छयागतो  भोगो  न   दु:खाय  न  तुष्टये॥

आसक्ति  का त्याग करें,  शक-संदेह  न काम।
भोग  भले आते  रहें, ना दुख-सुख  का नाम ॥3-14॥

 

अष्टावक्र महागीता 4

अष्टावक्र उवाच

हन्तात्मज्ञस्य  धीरस्य   खेलतो   भोगलीलया।
न  हि  संसारवाहीकै – र्मूढै:  सह   समानत:॥

आत्मज्ञानी   खेलता,  लीला  भोग   समान ।
सांसारिक जन से नहीं,  तुलना का अभिमान ॥4-1॥

यत्  पदं  प्रेप्सवो  दीना: शक्राद्या: सर्वदेवता:।
अहो  तत्र  स्थितो  योगी  न   हर्षमुपगच्छति॥

पद  जो   चाहे  देवता,  मिल  जाये  संसार ।
स्थिर योगी रहता सदा, हर  पल  हर्ष अपार ॥4-2॥

तज्ज्ञस्य  पुण्यपापाभ्यां  स्पर्शो  ह्यन्तर्न  जायते   ।
न  ह्याकाशस्य   धूमेन   दृश्यमानापि  सङ्गति:॥

पुण्य-पाप  का  ब्रह्म  से,  नाता  नहीं सुजान।
जैसे  गगन  धुआँ दिखे,  दृश्य  मात्र  पहचान॥4-3॥

आत्मैवेदं   जगत्सर्वं   ज्ञातं   येन   महात्मना ।
यदृच्छया  वर्तमानं  तं   निषेद्धुं   क्षमेत   क:॥

जगत  रुप जो  जानता,  महाआत्म का ज्ञान ।
कौन   रोक उसकी सके,  वर्तमान   पहचान ॥4-4॥

आब्रह्मस्तंबपर्यन्ते       भूतग्रामे     चतुर्विधे।
विज्ञस्यैव  हि    सामर्थ्य – मिच्छानिच्छाविवर्जने॥

तिनकों  से  हैं  ब्रह्म  तक, चार तरह के प्राण।
आत्म – ज्ञान समरथ सदा, इच्छा ना  बलवान ॥4-5॥

आत्मानमद्वयं   कश्चिज् – जानाति  जगदीश्वरं।
यद् वेत्ति तत्स  कुरुते न भयं  तस्य  कुत्रचित्॥

इक आत्मा, बिरला कहे, आत्म जगत भगवान ।
जो  है  ऐसा  जानता,  वह निर्भय   बलवान ॥4-6॥

 

अष्टावक्र महागीता 5

अष्टावक्र उवाच

न ते संगोऽस्ति केनापि किं  शुद्धस्त्यक्तुमिच्छसि।
संघातविलयं   कुर्वन् –  नेवमेव   लयं   व्रज ॥

साथ नहीं पर शुद्ध है, तजने का  क्या  काम।
संघ सोच को त्याग कर, ब्रह्म  लीन  हो धाम ॥5-1॥

उदेति  भवतो    विश्वं   वारिधेरिव    बुद्बुद:।
इति   ज्ञात्वैकमात्मानं   एवमेव   लयं   व्रज ॥

ज्यूँ  सागर  में बुलबुले, जग  आत्मा  से जान।
योग  मिले  उस  ब्रह्म से,  लो इसका संज्ञान ॥5-2॥

प्रत्यक्षमप्यवस्तुत्वाद्   विश्वं   नास्त्यमले  त्वयि।
रज्जुसर्प   इव   व्यक्तं   एवमेव   लयं   व्रज॥

मिथ्या  जग  प्रत्यक्ष दिखे, रस्सी-सर्प का भान।
योग  मिले  उस ब्रह्म  से,  ले लो ऐसा ज्ञान ॥5-3॥

समदु:खसुख:  पूर्ण   आशानैराश्ययो:   सम:।
समजीवितमृत्यु:    सन् – नेवमेव   लयं  व्रज॥

आस-निराश, सुख दुख सम, जीवन-मृत्यु  समान।
मिले  योग उस  ब्रह्म  से,  ले लो ऐसा ज्ञान ॥5-4॥

 

अष्टावक्र महागीता 6

अष्टावक्र उवाच

आकाशवदनन्तोऽहं   घटवत्   प्राकृतं  जगत् ।
इति  ज्ञानं तथैतस्य  न त्यागो  न  ग्रहो लय:॥

मैं  अनन्त  आकाश  हूँ, है जग  घड़े  समान ।
नहीं  ग्रहण ना त्याग हो,  एकरूप  हो  ज्ञान ॥6-1॥

महोदधिरिवाहं    स   प्रपंचो   वीचिसऽन्निभ:।
इति ज्ञानं  तथैतस्य  न  त्यागो  न ग्रहो लय:॥

महासिंधु  सा  मैं  यहाँ,  जग है लहर समान ।
नहीं  ग्रहण ना  त्याग हो, एकरूप  हो  ज्ञान ॥6-2॥

अहं  स  शुक्तिसङ्काशो  रूप्यवद्  विश्वकल्पना।
इति  ज्ञानं  तथैतस्य  न त्यागो  न ग्रहो लय:॥

सीप रजत  जैसी  दिखे, मुझमें  जग यह मान।
नहीं  ग्रहण ना त्याग हो,  एकरूप  हो  ज्ञान ॥6-3॥

अहं   वा    सर्वभूतेषु   सर्वभूतान्यथो   मयि।
इति  ज्ञानं  तथैतस्य  न त्यागो न  ग्रहो लय:॥

सब  जीवों  में  मैं  बसा,  सब  में मेरे प्राण ।
नहीं  ग्रहण ना त्याग हो,  एकरूप  हो  ज्ञान ॥6-4॥

 

अष्टावक्र महागीता 7

जनक उवाच

मय्यनंतमहांभोधौ      विश्वपोत     इतस्तत:।
भ्रमति    स्वांतवातेन   न  ममास्त्यसहिष्णुता॥

महासिंधु  सा  मैं  यहाँ,  जैसे  जगत  जहाज़।
इधर-उधर  वो  डोलता,  विघ्न पड़े  ना काज ॥7-1॥

मय्यनंतमहांभोधौ      जगद्वीचि:    स्वभावत:।
उदेतु  वास्तमायातु  न   मे  वृद्धिर्न च  क्षति:॥

महासिंधु  सा  मैं  यहाँ, जग ज्यूँ लहर स्वभाव।
अस्त-उदय माया सरिस,  घटे-बढ़े  ना  भाव  ॥7-2॥

मय्यनंतमहांभोधौ    विश्वं   नाम   विकल्पना।
अतिशांतो    निराकार     एतदेवाहमास्थित:॥

महासिंधु  सा  मैं  यहाँ,  सपना जगत सुजान ।
निराकार  मैं  शांत  हूँ,  शाश्वत  मेरी  शान ॥7-3॥

नात्मा  भावेषु  नो  भावस्-तत्रानन्ते  निरंजने ।
इत्यसक्तोऽस्पृह:    शान्त    एतदेवाहमास्थित: ॥

मैं  या  दूजा भाव ना, नहीं   सदोष, विशाल ।
शांत  रुप  ही  मैं  रहूँ,  शाश्वत  मेरा काल ॥7-4॥

अहो    चिन्मात्रमेवाहं   इन्द्रजालोपमं  जगत् ।
अतो   मम   कथं   कुत्र   हेयोपादेयकल्पना ॥

इन्द्रजाल  के ही  सदा, मैं  और जादू – जाल ।
क्यों कर ऐसी  कल्पना,   अच्छा-बुरा  सवाल ॥7-5॥

 

अष्टावक्र महागीता 8

अष्टावक्र उवाच

तदा  बन्धो यदा चित्तं किन्चिद् वांछति शोचति।
किंचिन् मुंचति गृण्हाति किंचिद् हृष्यति कुप्यति॥

शोक  करे  इच्छा करे,  करे ग्रहण  या त्याग ।
दुखी बने या सुख मिले, मन  बन्धन का भाग ॥8-1॥

तदा  मुक्तिर्यदा  चित्तं  न  वांछति  न शोचति ।
न  मुंचति  न गृण्हाति  न हृष्यति  न कुप्यति॥

मन  की मुक्ति  मान तभी, ना इच्छा ना शोक।
ग्रहण-त्याग करता नहीं,  हर्ष-क्रोध नहीं लोक  ॥8-2॥

तदा  बन्धो  यदा  चित्तं सक्तं  काश्वपि दृष्टिषु।
तदा  मोक्षो    यदा   चित्तम-सक्तं  सर्वदृष्टिषु॥

बंधन है  जब  मन  फँसा, जो देखा हो प्यार ।
आसक्ति  जब हो नहीं,  समझ मोक्ष का द्वार॥8-3॥

यदा  नाहं  तदा  मोक्षो  यदाहं  बन्धनं  तदा।
मत्वेति  हेलया  किंचिन्-मा  गृहाण विमुंच मा॥

मैं  नहीं  तो  मोक्ष  है,  मैं  में  बंधन  जान।
ना त्यागो न ग्रहण करो,  ले  लो  ऐसा  ज्ञान॥8-4॥

 

अष्टावक्र महागीता 9

अष्टावक्र उवाच

क्रिताकृ ते च द्वन्द्वानि कदा शान्तानि कस्य वा।
एवं   ज्ञात्वेह  निर्वेदाद्  भव   त्यागपरोऽव्रती ॥

करूँ ना  करूँ द्वन्द बड़ा, शांति  मिले ना  जान।
त्याग सभी वैराग्य ले,  ऐसे  नियम  न  मान॥9-1॥

कस्यापि  तात  धन्यस्य  लोकचेष्टावलोकनात् ।
जीवितेच्छा   बुभुक्षा  च  बुभुत्सोपशमं  गता: ॥

व्यर्थ  चेष्टा  लोक  की, धन्य पुरुष ही  जान।
चाहत जीवन की  मिटे, भोज-भोग  ना  भान ॥9-2॥

अनित्यं        सर्वमेवेदं       तापत्रयदूषितं।
असारं  निन्दितं  हेयमि-ति  निश्चित्य शाम्यति॥

कुछ  भी है टिकता नहीं, सब दोषों का जाल।
सारहीन,  निंदा  करें,  शांति धर्म   को पाल ॥9-3॥

कोऽसौ कालो वय: किं वा यत्र द्वन्द्वानि नो नृणां।
तान्युपेक्ष्य    यथाप्राप्तवर्ती   सिद्धिमवाप्नुयात् ॥

उम्र, समय वह कौन सा, नहीं संशय का नाम ।
रखे  उपेक्षित भाव  जो,  मिले सिद्ध का धाम ॥9-4॥

नाना  मतं  महर्षीणां  साधूनां  योगिनां तथा ।
दृष्ट्वा  निर्वेदमापन्न:  को  न शाम्यति मानव: ॥

ऋषि  साधु  योगी  कई,  मत है जहाँ अनेक ।
कैसे  वैरागी  न   हो,  शांत  मनस्वी  नेक ॥9-5॥

कृत्वा  मूर्तिपरिज्ञानं  चैतन्यस्य  न किं   गुरु:।
निर्वेदसमतायुक्त्या     यस्तारयति     संसृते:      ॥

ज्ञान  चित्त  का  हो जिसे, गुरु है ऐसा कौन ।
करे मुक्त  बंधन से जो, समता  युक्त है मौन॥9-6॥

पश्य   भूतविकारांस्त्वं   भूतमात्रान्  यथार्थत: ।
तत्क्षणाद्  बन्धनिर्मुक्त:  स्वरूपस्थो  भविष्यसि॥

बदले  मात्रा  तत्व  की,  पैदा  होत  विकार ।
मुक्त   ज्ञान   ऐसा   करे,   होवे  बेड़ा पार ॥9-7॥

वासना  एव  संसार  इति  सर्वा  विमुंच  ता: ।
तत्त्यागो  वासनात्यागा-तित्थितिरद्य  यथा तथा॥

इच्छा  ही  संसार  है, कर लो  उसका  त्याग ।
सब त्यागो इच्छा तजे,  स्थापित  होकर  जाग॥9-8॥

 

अष्टावक्र महागीता 10

अष्टावक्र उवाच

विहाय  वैरिणं  कामम-के   थं   चानर्थसंकुलं ।
धर्ममप्येतयोर्हेतुं      सर्वत्रानादरं        कुरु॥

त्याग  कामना  अर्थ भी, धन-अर्जन  के नाग ।
धर्म  त्याग  से युक्त  हो, हो विरक्ति अनुराग॥10-1॥

स्वप्नेन्द्रजालवत्  पश्य  दिनानि  त्रीणि पंच वा।
मित्रक्षेत्रधनागार      –      दारदायादिसंपद: ॥

तीन पाँच दिन ही  टिके, लगे स्वप्न  का जाल।
जर,  ज़मीन  या मित्र हो, या फिर दूजा माल ॥10-2॥

यत्र  यत्र   भवेत्तृष्णा  संसारं  विद्धि  तत्र  वै।
प्रौढवैराग्यमाश्रित्य   वीततृष्ण:   सुखी   भव ॥

आसक्ति  होती  जहाँ,  समझ   वही  संसार ।
साथ  जहाँ  बैराग  है,  तृष्णा रहित   विचार॥10-3॥

तृष्णामात्रात्मको  बन्धस्-तन्नाशो  मोक्ष  उच्यते।
भवासंसक्तिमात्रेण          प्राप्तितुष्टिर्मुहुर्मुहु:॥

बंधन  केवल  कामना, मोक्ष   मिले हो  नाश ।
मात्र  विरक्ति  से  मिले, आनन्दित  आभास ॥10-4॥

त्वमेकश्चेतन:   शुद्धो    जडं    विश्वमसत्तथा ।
अविद्यापि न किंचित्सा  का बुभुत्सा तथापि ते॥

तुम ही   चेतन शुद्ध हो,  जड़  मिथ्या  संसार।
लेशमात्र  अज्ञान  नहीं,  जानो  नहीं  विचार ॥10-5॥

राज्यं  सुता:  कलत्राणि शरीराणि  सुखानि च ।
संसक्तस्यापि   नष्टानि  तव  जन्मनि  जन्मनि॥

पुत्र, राज, स्त्री, तन-मन भी, सब मिलें कई बार।
कितनी भी  आसक्ति हो,  मिट जाते हर बार ॥10-6॥

अलमर्थेन   कामेन   सुकृ  तेनापि   कर्मणा ।
एभ्य:  संसारकान्तारे  न  विश्रान्तमभून्  मन:॥

धन  अपार या कामना,  या शुभ काम हज़ार ।
जग माया  कोई  रहे,  हो ना   शांत  विचार ॥10-7॥

कृतं  न  कति जन्मानि  कायेन  मनसा गिरा ।
दु:खमायासदं       कर्म   तदद्याप्युपरम्यताम्॥

व्यर्थ  अनेकों जन्म किये,  काया मन का घात।
भोग सब दुख कर्म के,  हो  विरक्ति अब  बात॥10-8॥

 

अष्टावक्र महागीता 11

अष्टावक्र उवाच

भावाभावविकारश्च    स्वभावादिति    निश्चयी।
निर्विकारो      गतक्लेश:   सुखेनैवोपशाम्यति॥

जनम-मरण विकार समझ, स्वाभाविक है जान ।
निर्विकार हो क्लेशरहित, सुख-शांति का भान॥11-1॥

ईश्वर:  सर्वनिर्माता  नेहान्य    इति   निश्चयी।
अन्तर्गलितसर्वाश:  शान्त:  क्वापि  न   सज्जते॥

निर्माता  ईश्वर  सदा,  निश्चित  ऐसा   जान।
अंत आंतरिक  चाह का,  शांति का हो भान॥11-2॥

आपद:  संपद:   काले   दैवादेवेति   निश्चयी।
तृप्त:  स्वस्थेन्द्रियो नित्यं न वान्छति न शोचति

सुख-दुख  ऐसे  काल  है, पूर्व  कर्म  अनुसार ।
रहे  संयमित इन्द्रियाँ,  शोक न  चाह न भार ॥11-3॥

सुखदु:खे    जन्ममृत्यू    दैवादेवेति   निश्चयी।
साध्यादर्शी   निरायास:   कुर्वन्नपि  न लिप्यते॥

जन्म-मरण, सुख-दुख  सदा, पूर्व कर्म अनुसार ।
कर्म करें फल चाह बिन, लिप्त  न हो बेकार  ॥11-4॥

चिन्तया  जायते  दु:खं  नान्यथेहेति   निश्चयी।
तया हीन:  सुखी  शान्त:  सर्वत्र  गलितस्पृह:॥

चिंता  से ही दुख मिले,  जो निश्चित ले जान।
शांत  सुखी  हर पल रहे,  इच्छारहित सुजान ॥11-5॥

नाहं  देहो  न  मे  देहो बोधोऽहमिति निश्चयी ।
कैवल्यं  इव  संप्राप्तो  न स्मरत्यकृतं कृतम्  ॥

तन  मेरा ना  देह मैं,  रखता  जो  यह ज्ञान ।
उसको ही मुक्ति  मिले, कर्म – अकर्म ना भान॥11-6॥

आब्रह्मस्तंबपर्यन्तं      अहमेवेति     निश्चयी।
निर्विकल्प:  शुचि:  शान्त: प्राप्ताप्राप्तविनिर्वृत:॥

तृण-ब्रह्मा  हूँ मैं सकल,  जो ले निश्चित  जान।
शुद्ध-शांत  इच्छा रहित, प्राप्ति-अप्राप्ति समान ॥11-7॥

नाश्चर्यमिदं  विश्वं   न   किंचिदिति   निश्चयी।
निर्वासन:  स्फूर्तिमात्रो  न  किंचिदिव शाम्यति॥

जग  अचरज पर  है नही, जो जाने यह सार  ।
जीवित  पर इच्छा रहित,  पाये  शांति अपार ॥11-8॥

 

अष्टावक्र महागीता 12

जनक उवाच

कायकृत्यासह:   पूर्वं    ततो  वाग्विस्तरासह: ।
अथ    चिन्तासहस्तस्माद्    एवमेवाहमास्थित:॥

बैरागी  हो  कर्म  से,   वाणी  भी   निरपेक्ष ।
चिंता  से  निर्लिप्त  रहे,  ख़ुद  में ही  सापेक्ष॥12-1॥

प्रीत्यभावेन    शब्दादेर – दृश्यत्वेन    चात्मन:।
विक्षेपैकाग्रहृदय            एवमेवाहमास्थित:॥

शब्द,  भाव से हो रहित, आत्म  विषय न  वास।
उदासीन  मन  से हुआ, अब  एकाग्र  निवास ॥12-2॥

समाध्यासादिविक्षिप्तौ     व्यवहार:   समाधये ।
एवं   विलोक्य    नियमं    एवमेवाहमास्थित:॥

मिथ्या  से विचलित  नहीं, ध्यान भरा व्यवहार।
सब कुछ नियमों से बँधा, स्थित में ही है  सार॥12-3॥

हेयोपादेयविरहाद्      एवं      हर्षविषादयो: ।
अभावादद्य   हे   ब्रह्मन्    एवमेवाहमास्थित:॥

छोड़े  या  संग्रह   करे,   हर्ष-विषाद  अभाव ।
हे!  ब्रह्मन्  मैं  जानता,  स्थित  रहे  स्वभाव॥12-4॥

आश्रमानाश्रमं   ध्यानं   चित्तस्वीकृत  तवर्जनं।
विकल्पं   मम   वीक्ष्यै  –  तैरेवमेवाहमास्थित:॥

आश्रम  हो  या हो नहीं,  वर्जित या स्वीकार।
हो विकल्प  मन में  कई, स्थिर  मेरा  विचार॥12-5॥

कर्मानुष्ठानमज्ञानाद्          यथैवोपरमस्तथा।
बुध्वा    सम्यगिदं   तत्त्वं   एवमेवाहमास्थित:॥

कर्म  किये  अज्ञानवश,  निवृत  होकर काज ।
ज्ञान तत्व सम्यक् सदा, समझा मैं स्थित आज ॥12-6॥

अचिंत्यं  चिंत्यमानोऽपि  चिन्तारूपं  भजत्यसौ।
त्यक्त्वा  तद्भावनं  तस्माद्   एवमेवाहमास्थित:॥

चिंतन करूँ अचिंत्य का,  करता  सोच विचार ।
चिंतन का भी त्याग करूँ, स्थिर मेरा आचार॥12-7॥

एवमेव  कृतं  येन   स कृ  तार्थो   भवेदसौ ।
एवमेव  स्वभावो  य:  स कृतार्थो   भवेदसौ॥

हो  ऐसा  जब  आचरण, मुक्ति  मिले संसार ।
यह  स्वभाव  जिसका रहे,  भवसागर से पार ॥12-8॥

 

अष्टावक्र महागीता 13

जनक उवाच

अकिंचनभवं   स्वास्थ्यं   कौपीनत्वेऽपि  दुर्लभं।
त्यागादाने   विहायास्माद – हमासे  यथासुखम् ॥

कहना  मेरा  सहज ना,  धर  साधू  का वेश ।
त्याग-ग्रहण आदत तजे,  सुखमय  हो परिवेश ॥13-1॥

कुत्रापि  खेद:  कायस्य  जिह्वा  कुत्रापि खेद्यते।
मन:  कुत्रापि तत्त्यक्त्वा पुरुषार्थे स्थित: सुखम्॥

तन-मन  या  वाणी  रहे, खेद  न कोई  बात ।
त्याग  प्रयासों  को  सभी, सदा सुखी मैं तात ॥13-2॥

कृतं  किमपि नैव स्याद् इति संचिन्त्य तत्त्वत:।
यदा  यत्कर्तुमायाति  तत् कृत्वासे यथासुखम् ॥

कर्मों का अस्तित्व नहीं, तात्विक सकल विचार ।
कर्म  सभी  करता रहूँ,  सदा सुखी  व्यवहार ।13-3॥

कर्मनैष्कर्म्यनिर्बन्ध  –   भावा    देहस्थयोगिन:।
संयोगायोगविरहादह  –  मासे     यथासुखम्  ॥

कर्म-अकर्म के भाव-बंध,  योगी  देह  विराज ।
तज  संयोग-वियोग  सब, सदा सुखी  हो राज ॥13-4॥

अर्थानर्थौ  न मे स्थित्या  गत्या न  शयनेन वा।
तिष्ठन्  गच्छन् स्वपन् तस्मादहमासे यथासुखम्॥

शयन  सपन  बैठूँ  चलूँ, गति  हो या विश्राम ।
अर्थ  अनर्थ  हूँ  परे,  अत:  यही  सुखधाम ॥13-5॥

स्वपतो  नास्ति  मे हानि: सिद्धिर्यत्नवतो न वा।
नाशोल्लासौ  विहायास् – मदहमासे  यथासुखम् ॥

स्वप्नों  में  हानि  नहीं,  ना   यत्नों  में माल।
शोक-हर्ष  समता  रहे, सदा सुखी  है   चाल ॥13-6॥

सुखादिरूपा  नियमं   भावेष्वालोक्य   भूरिश:।
शुभाशुभे  विहायास्मादह – मासे   यथासुखम् ॥

सुख-दुख नियमित क्रम  रहे,  समझा यह आचार।
शुभ-अशुभ से चिंतित ना, सदा सुखी  संसार  ॥13-7॥

 

अष्टावक्र महागीता 14

जनक उवाच

प्रकृत्या  शून्यचित्तो  य: प्रमादाद्  भावभावन: ।
निद्रितो  बोधित  इव  क्षीण-संस्मरणो  हि स: ॥

भावहीन  इच्छारहित,  जो  भी  होय स्वभाव ।
मुक्त  पुरातन याद से,  जाग  सपन  ना भाव ॥14-1॥

क्व  धनानि  क्व  मित्राणि  क्व मे विषयदस्यव: ।
क्व  शास्त्रं  क्व च विज्ञानं यदा मे गलिता स्पृहा॥

विषय मित्र या धन रहे,  यह  ना  मेरा काम ।
शास्त्र  रहे  विज्ञान रहे,  मैं  हरदम  निष्काम॥14-2॥

विज्ञाते    साक्षिपुरुषे    परमात्मनि   चेश्वरे ।
नैराश्ये  बंधमोक्षे  च  न  चिंता  मुक्तये  मम॥

साक्षी  पुरु  परमात्मा,  ईश्वर  का  है  भान ।
मोक्ष  से  निरपेक्ष  हुआ, मोक्ष सोच ना जान ॥14-3॥

अंतर्विकल्पशून्यस्य    बहि:    स्वच्छन्दचारिण:।
भ्रान्तस्येव  दशास्तास्तास्-तादृशा  एव  जानते ॥

विकल्पशून्य जो मैं रहूँ, हो  स्वच्छन्द  व्यवहार।
मुक्त  ही   पहचान  सके,   मुक्तमना  संसार॥14-4॥

 

अष्टावक्र महागीता 15

अष्टावक्र उवाच

यथातथोपदेशेन     कृतार्थ:     सत्त्वबुद्धिमान्।
आजीवमपि   जिज्ञासु:    परस्तत्र   विमुह्यति॥

सहज  सीख  भी  तार दे,  सात्विक बुद्धिमान॥
आजीवन  वंचित  रहे,  जिज्ञासु   बिन  ज्ञान॥15-1॥

मोक्षो  विषयवैरस्यं   बन्धो   वैषयिको   रस:।
एतावदेव   विज्ञानं   यथेच्छसि   तथा   कुरु॥

मिले मोक्ष,  तज के विषय, बंधन रस हो जान।
करिये  वह  जो ठीक  हो, जब हो ऐसा ज्ञान ॥15-2॥

वाग्मिप्राज्ञामहोद्योगं      जनं     मूकजडालसं।
करोति   तत्त्वबोधोऽयम-तस्त्यक्तो   बुभुक्षभि:॥

मितभाषी  सुब्ाुद्घि  जन,  तत्वज्ञान  की  चाह  ।
जीवन  वो  ऐसे  जिये,  रहे  मौन  की  राह ॥15-3॥

न त्वं देहो न ते देहो भोक्ता  कर्ता  न वा भवान् ।
चिद्रूपोऽसि  सदा  साक्षी  निरपेक्ष:  सुखं  चर ॥

न तन  तेरा  ना देह तू, भोग न  कर्ता  मान ।
चेतन, साक्ष, इच्छा रहित, रहना  सुख-सम्मान ॥15-4॥

रागद्वेषौ   मनोधर्मौ   न   मनस्ते   कदाचन।
निर्विकल्पोऽसि  बोधात्मा  निर्विकार: सुखं चर ॥

राग-द्वेष मन के धरम,  आप नहीं ‘मन’ जान।
बिन विकार बिन कामना,  ज्ञानरुप सुख मान ॥15-5॥

सर्वभूतेषु    चात्मानं    सर्वभूतानि   चात्मनि ।
विज्ञाय   निरहंकारो   निर्ममस्त्वं  सुखी  भव॥

सकल  जीव  तुझमें  बसे, तू बसता सब जीव ।
अहंकार आसक्ति तज,  रख ले सुख की नींव ॥15-6॥

विश्वं   स्फुरति   यत्रेदं  तरंगा  इव   सागरे ।
तत्त्वमेव  न   सन्देह – श्चिन्मूर्ते  विज्वरो  भव॥

सागर  से  लहरें  उठे,  जग  वैसे  तू  आय ।
नि:सन्देह  चैतन्य   तू,  चिंता रहित   उपाय ॥15-7॥

श्रद्धस्व  तात  श्रद्धस्व नात्र मोऽहं कुरुष्व भो: ।
ज्ञानस्वरूपो  भगवा-नात्मा   त्वं  प्रकृते:  पर:॥

निष्ठा-श्रद्धा अनुभव पे,  मत  मोहित हो तात।
ज्ञानरूप  भगवान तू,  है    निसर्ग बिन  बात॥15-8॥

गुणै:  संवेष्टितो  देह-स्तिष्ठत्यायाति  याति च।
आत्मा  न  गंता  नागंता   किमेनमनुशोचसि ॥

देह  गुणों  से  है  बने,  जन्म-मरण का राग ।
आई गई  ना  आत्मा,  शोक  न  तेरा  भाग ॥15-9॥

देहस्तिष्ठतु   कल्पान्तं  गच्छत्वद्यैव   वा   पुन: ।
क्व वृद्धि:  क्व च वा हानिस्-तव चिन्मात्ररूपिण: ॥

रहे अंत तक देह यह,  या फिर नष्ट हो आज ।
क्या  हानि या  लाभ हैं, चैतन  का ना काज ॥15-10॥

त्वय्यनंतमहांभोधौ    विश्ववीचि:     स्वभावत:।
उदेतु  वास्तमायातु  न  ते  वृद्धिर्न  वा  क्षति:॥

ज्यूँ सागर   लहरें उठें,  उसका  यही  स्वभाव ।
उदय-अस्त  जग  तुझसे है,  बढ़े-घटे ना भाव ॥15-11॥

तात  चिन्मात्ररूपोऽसि  न  ते भिन्नमिदं जगत्।
अत:   कस्य   कथं  कुत्र   हेयोपादेयकल्पना॥

तुम चैतन्य स्वरूप हो,  अलग  नहीं जग जान।
ऊँच-नीच  कोई  नहीं,  हो  ना  सोच सुजान ॥15-12॥

एकस्मिन्नव्यये  शान्ते   चिदाकाशेऽमले   त्वयि।
कुतो  जन्म  कुतो  कर्म  कुतोऽहंकार एव च ॥

शांत  अनन्त आकाश में, तुम हो खड़े कुमार।
क्या  जन्म,  कैसा करम,  कैसा  ये अहंकार ॥15-13॥

यत्त्वं    पश्यसि  तत्रैकस्-त्वमेव    प्रतिभाससे।
किं  पृथक्  भासते  स्वर्णात्  कटकांगदनूपुरम् ॥

तू  है एक, अनेक दिखे,  प्रतिबिंबित हो काँच ।
कंगना या  पायल  रहे,  सोना  ही  है  साँच ॥15-14॥

अयं  सोऽहमयं  नाहं   विभागमिति   संत्यज ।
सर्वमात्मेति  निश्चित्य  नि:सङ्कल्प:  सुखी  भव॥

यह मैं हूँ यह मैं  नहीं, करो  द्वैत  का  त्याग।
तुम ही आत्स्वरूप सकल, संकल्प बिना सुख जाग॥15-15॥

तवैवाज्ञानतो    विश्वं    त्वमेक:   परमार्थत:।
त्वत्तोऽन्यो  नास्ति संसारी नासंसारी च कश्चन॥

तुम ही जगत,  अज्ञान हैं, तुम हो एक सुजान ।
संसारी दूजा  नहीं,  तुम  से अलग न   जान ॥15-16॥

भ्रान्तिमात्रमिदं  विश्वं  न  किंचिदिति  निश्चयी।
निर्वासन:  स्फूर्तिमात्रो न  किंचिदिव  शाम्यति॥

भ्रान्तिमात्र  है  यह जगत,  ऐसा निश्चित जान।
त्याग  चाह-चेष्टा रहित, नहीं शांति का  भान ॥15-17॥

एक  एव  भवांभोधा – वासीदस्ति  भविष्यति ।
न ते बन्धोऽस्ति मोक्षो वा कृत्यकृत्य: सुखं चर॥

भवसागर  बस  एक  है,  सदा  रहेगा  एक।
मोक्ष-बंध तुममें नहीं, सुख  विचरण कर  नेक ॥15-18॥

मा  सङ्कल्पविकल्पाभ्यां  चित्तं  क्षोभय  चिन्मय।
उपशाम्य   सुखं    तिष्ठ  स्वात्मन्यानन्दविग्रहे॥

संकल्प-विकल्प के फेर में,  करो न चित्त अशांत।
सुखपूर्वक  आनंद  में,  कर लो मन को शांत ॥15-19॥

त्यजैव  ध्यानं  सर्वत्र मा  किंचिद्  हृदि धारय।
आत्मा त्वं मुक्त एवासि किं विमृश्य  करिष्यसि॥

तजो ध्यान सब ओर से, मन में शांति अपार।
आत्मरूप  तुम मुक्त  हो,  हो न कोई  विचार॥15-20॥

 

अष्टावक्र महागीता 16

अष्टावक्र उवाच

आचक्ष्व  शृणु  वा  तात  नानाशास्त्राण्यनेकश:।
तथापि  न तव  स्वास्थ्यं  सर्वविस्मरणाद्  ऋते॥

सुनकर  ज्ञानी से वचन, पढ़ कर शास्त्र अनेक ।
मिले  रूप  वैसा  नहीं,  उचित अचेत  हरेक ॥16-1॥

भोगं  कर्म  समाधिं  वा कुरु  विज्ञ तथापि ते ।
चित्तं   निरस्तसर्वाशाम – त्यर्थं    रोचयिष्यति॥

कर्म – ध्यान लीन हो,  पर  तुम  हो  विद्वान।
शांत रखो मन कामना,  आनन्दित  हो  भान ॥16-2॥

आयासात्सकलो  दु:खी  नैनं  जानाति  कश्चन।
अनेनैवोपदेशेन   धन्य:   प्राप्नोति   निर्वृतिम्॥

दुखी  प्रयत्नों से  सदा,  लोग  न  ऐसा मान ।
होय  धन्य  उपदेश  से,  वृत्तिरहित  हो जान॥16-3॥

व्यापारे    खिद्यते   यस्तु   निमेषोन्मेषयोरपि।
तस्यालस्य  धुरीणस्य  सुखं  नन्यस्य कस्यचित्॥

पलके  खोलें  बंद  करें,  वो भी लगता काज ।
सुखी  रहे  वो  आलसी,  और न जाने राज  ॥16-4॥

इदं  कृतमिदं  नेति    द्वंद्वैर्मुक्तं   यदा   मन:।
धर्मार्थकाममोक्षेषु   निरपेक्षं    तदा    भवेत् ॥

करूँ न करूँ के द्वन्द से,  मुक्त हो जब इंसान।
काम,  मोक्ष  धर्मार्थ की, रहे  चाह  ना  जान॥16-5॥

विरक्तो    विषयद्वेष्टा   रागी   विषयलोलुप:।
ग्रहमोक्षविहीनस्तु  न  विरक्तो   न   रागवान्॥

विषय-द्वेष विरक्त  नहीं, विषय न लोलुप राग ।
ग्रहण-त्याग  के  बिन बने,  राग-द्वेष से जाग॥16-6॥

हेयोपादेयता     तावत्   –  संसारविटपांकुर: ।
स्पृहा  जीवति  यावद्  वै  निर्विचारदशास्पदम्॥

लेन-देन  हो  भावना,  जग  अंकुर का वास  ।
जीवन  मुक्ति    चाहिये,  सोच हीन  आवास॥16-7॥

प्रवृत्तौ   जायते   रागो  निर्वृत्तौ  द्वेष एव हि।
निर्द्वन्द्वो  बालवद्  धीमान्  एवमेव  व्यवस्थित:॥

राग  प्रवृत्ति  से  जगे,  निवृत्त   होकर  द्वेष।
हो विरक्त बालक सरिस,  स्थापित हो परिवेश ॥16-8॥

हातुमिच्छति  संसारं   रागी    दु:खजिहासया ।
वीतरागो  हि  निर्दु:खस्-तस्मिन्नपि  न खिद्यति॥

चाहे  दुख  से  भागना,  जग  तजने  तैयार ।
सुखी विरक्त हर हाल में, दुख  व दर्द से पार ॥16-9॥

यस्याभिमानो  मोक्षेऽपि  देहेऽपि  ममता  तथा।
न च ज्ञानी न वा  योगी  केवलं  दु:खभागसौ ॥

मोक्ष  की  भी  चाह  है,  रहे  देह  से प्यार ।
ना ज्ञानी,  योगी नहीं,  दुख  ही मिले  अपार ॥16-10॥

हरो   यद्युपदेष्टा  ते  हरि:  कमलजोऽपि  वा।
तथापि  न   तव   स्वाथ्यं    सर्वविस्मरणादृते॥

ब्रह्मा  विष्णु  महेश  भी,  हो  उपदेशक हाथ ।
मिले विस्मृति बिन नहीं,  आत्मरुप  का साथ ॥16-11॥

 

अष्टावक्र महागीता 17

अष्टावक्र उवाच

तेन  ज्ञानफलं  प्राप्तं   योगाभ्यासफलं   तथा ।
तृप्त:  स्वच्छेन्द्रियो  नित्यं एकाकी रमते तु य: ॥

उसने पाया  ज्ञानफल,  योग  सफल अभ्यास ।
इन्द्रजीत  ख़ुद में रहे,  बची  न  कोई  प्यास॥17-1॥

न  कदाचिज्जगत्यस्मिन्  तत्त्वज्ञा  हन्त  खिद्यति ।
यत   एकेन   तेनेदं   पूर्णं   ब्रह्माण्डमण्डलम्॥

जान  तत्व जिसने लिया,  नहीं दुखी वह जान।
एक ब्रह्म  से है सकल,  समझो  विश्व विधान॥17-2॥

न जातु विषया:  केऽपि  स्वारामं  हर्षयन्त्यमी ।
सल्लकीपल्लवप्रीत   –   मिवेभं     निंबपल्लवा:॥

जो रमता निज आत्म में,  विषय न उसको भाय।
पर्ण सलाई  पात लगे,  नीम  न हस्ति चबाय ॥17-3॥

यस्तु   भोगेषु   भुक्तेषु  न   भवत्यधिवासिता।
अभुक्तेषु    निराकांक्षी    तदृशो   भवदुर्लभ: ॥

ना भोगा ना भोग्य है,  आसक्ति  नहीं  भाव ।
ऐसे  जन  इच्छारहित,  दुर्लभ  है  हर  गाँव ॥17-4॥

बुभुक्षुरिह      संसारे     मुमुक्षुरपि   दृश्यते।
भोगमोक्षनिराकांक्षी    विरलो   हि  महाशय: ॥

भोग-मोक्ष  जो  चाहते,  दोनों  मिले  अनेक ।
दोनों  इच्छा  से  रहित,  मिले न  कोई एक ॥17-5॥

धर्मार्थकाममोक्षेषु    जीविते    मरणे    तथा।
कस्याप्युदारचित्तस्य    हेयोपादेयता   न   हि॥

काम-मोक्ष  या  धर्म-अर्थ,  जीना-मरना  तात ।
अनुपयोग-उपयोग   भी,   सम  महात्मा बात ॥17-6॥

वांछा  न  विश्वविलये  न  द्वेषस्तस्य च स्थितौ  ।
यथा जीविकया  तस्माद् धन्य आस्ते यथा सुखम्  ॥

विश्व  लीनता  चाह  नहीं,  ना  है इससे द्वेष ।
धन्य  रहे  हर  हाल  में,  सुखी रहे  परिवेश ॥17-7॥

कृतार्थोऽनेन  ज्ञानेने-त्येवं   गलितधी:   कृती ।
पश्यन् शृण्वन् स्पृशन्  जिघ्रन्  अश्नन्नस्ते यथा सुखम् ॥

ज्ञान  का  उपकार  रहे,   बुद्धि   अन्तर्ध्यान ।
स्पर्श  देख-सुन, सूंघ  के,  खाये सुख से जान ॥17-8॥

शून्या  दृष्टिर्वृथा  चेष्टा  विकलानीन्द्रियाणि  च।
न  स्पृहा   न   विरक्तिर्वा   क्षीणसंसारसागरे॥

दृष्टि  शून्य  और  इन्द्रियाँ, चेष्टाओं का नाश।
नहीं  विरक्ति  या आसक्ति, क्षीण जगत ना रास॥17-9॥

न  जगर्ति  न निद्राति  नोन्मीलति  न मीलति।
अहो    परदशा   क्वापि   वर्तते  मुक्तचेतस:॥

ना जागे,  सोयें  नहीं,  बंद  न  खोले  आँख ।
परम  मुक्त  चैतन्यता,  बिरला  ऐसी   शाख़॥17-10॥

सर्वत्र   दृश्यते   स्वस्थ:   सर्वत्र   विमलाशय: ।
समस्तवासना  मुक्तो   मुक्त:   सर्वत्र   राजते ॥

मन हर पल स्थापित दिखे, सदा साफ़ अभिप्राय ।
सकल वासना मुक्त रहे, मुक्त  सदा  ही  पाय॥17-11॥

पश्यन् शृण्वन् स्पृशन् जिघ्रन् अश्नन् गृण्हन् वदन् व्रजन्।
ईहितानीहितैर्मुक्तो   मुक्त    एव    महाशय: ॥

देख, सुन, सूँघ, स्पर्श करे, खा,  लेन, बोल-चाल।
इच्छा  रहे  या  न रहे,  मुक्त महात्म्य कमाल ॥17-12॥

न  निन्दति न च स्तौति  न हृष्यति न कुप्यति।
न  ददाति  न  गृण्हाति  मुक्त:  सर्वत्र नीरस:॥

निंदा  ना  स्तुति  करे,  ख़ुशी न हो  नाराज़ ।
लेता-देता  ना  कभी,  मुक्त  विरक्त है आज ॥17-13॥

सानुरागां  स्त्रियं  दृष्ट्वा  मृत्युं  वा समुपस्थितं।
अविह्वलमना:  स्वस्थो   मुक्त  एव   महाशय:॥

नेह  सहित  नारी  रहे,  या सम्मुख  यमराज ।
उदासीन  सबसे  रहे,  मुक्त  महाशय   आज॥17-14॥

सुखे  दु:खे  नरे  नार्यां  संपत्सु   विपत्सु  च।
विशेषो   नैव   धीरस्य   सर्वत्र   समदर्शिन: ॥

सुख-दुख,  नर-नारी रहे,  धनो विनाश समान ।
जन  की  धीर  विशेषता, पड़े  एक सा जान ॥17-15॥

न  हिंसा नैव  कारुण्यं  नौद्धत्यं न च दीनता ।
नाश्चर्यं   नैव च   क्षोभ:  क्षीणसंसरणे   नरे ॥

हिंसा  ना  करुणा नहीं,  गर्व, दीन नहीं भाव ।
क्षोभ न अचरज जगत से, जग से नहीं जुड़ाव ॥17-16॥

न  मुक्तो  विषयद्वेष्टा  न   वा  विषयलोलुप:।
असंसक्तमना     नित्यं     प्राप्ताप्राप्तमुपाश्रृते॥

मुक्त  पुरुष रखता  नहीं,  विषय-द्वेष या राग ।
भले  मिले  या ना मिले,  समता भरा विराग ॥17-17॥

समाधानसमाधान     –    हिताहितविकल्पना:।
शून्यचित्तो  न  जानाति  कैवल्यमिव   संस्थित:॥

समाधान-संदेह  परे,  हित  ना  अहित विचार ।
शून्य  चित्त का भाव लिये,  मोक्ष यही है सार॥17-18॥

निर्ममो  निरहंकारो  न  किंचिदिति   निश्चित:।
अन्तर्गलितसर्वाश:    कुर्वन्नपि    करोति   न ॥

अहंकार  न  ममत्व  ही,  जग में मिथ्या भान।
करता पर करता  नहीं,  इच्छा रहित  सुजान ॥17-19॥

मन:प्रकाशसंमोह         स्वप्नजाड्यविवर्जित:।
दशां  कामपि  संप्राप्तो  भवेद्   गलितमानस:॥

मन  प्रकाशित  मोह नहीं, जड़ता-स्वप्न समान।
दशा लगे सब कुछ मिला, बिन इच्छा मन जान॥17-20॥

 

अष्टावक्र महागीता 18

अष्टावक्र उवाच

यस्य  बोधोदये  तावत्-स्वप्नवद्  भवति  भ्रम:।
तस्मै   सुखैकरूपाय   नम:   शान्ताय  तेजसे॥

जब उदय हो ज्ञान का,  यूँ   सपने  से  जाग।
कर ले उस सुख को नमन, शांति तेज़ का राग ॥18-1॥

अर्जयित्वाखिलान् अर्थान् भोगानाप्नोति पुष्कलान्।
न  हि   सर्वपरित्याजम-न्तरेण   सुखी  भवेत्॥

साधन  अर्जित सब करें, भोगे  जगत  प्रताप ।
त्याग बिना इस भोग का,  सुखी न होवे आप ॥18-2॥

कर्तव्यदु:खमार्तण्डज्वालादग्धान्तरात्मन: ।
कुत:    प्रशमपीयूषधारा – सारमृते    सुखम् ॥

कर्तव्य-दु:ख अति तेज अगन, अन्तर्मन जल जाय।
कैसे अमृत-धार मिले,  कर्म  त्याग सुख भाय ॥18-3॥

भवोऽयं  भावनामात्रो  न  किंचित्  परमर्थत:।
नास्त्यभाव:  स्वभावनां  भावाभावविभाविनाम् ॥

परमारथ  कुछ भी नहीं,  भाव-अभाव स्वभाव ।
स्थित पदार्थ  का भी नहीं,  कोई कहीं अभाव ॥18-4॥

न  दूरं  न  च  संकोचाल्-लब्धमेवात्मन:  पदं।
निर्विकल्पं  निरायासं    निर्विकारं    निरंजनम्॥

मिली  हुई  है  आत्मा,  नहीं  दूर  ना  पास ।
वास  वहीं तेरा निर्मल,  नहीं   विकल्प  प्रयास॥18-5॥

व्यामोहमात्रविरतौ          स्वरूपादानमात्रत: ।
वीतशोका       विराजन्ते    निरावरणदृष्टय:॥

अज्ञान  से   पर्दा  उठे,   ज्ञान   साक्षात्कार ।
शोक रहित  स्वराज  करे, होते  दूर  विकार  ॥18-6॥

समस्तं   कल्पनामात्र-मात्मा  मुक्त:   सनातन:।
इति  विज्ञाय  धीरो हि  किमभ्यस्यति बालवत्॥

सब कुछ  कोरी  कल्पना,  मुक्त  आत्मा जान।
धीर  पुरुष जाने सदा,  क्यूँ  कर बाल समान ॥18- 7॥

आत्मा  ब्रह्मेति निश्चित्य भावाभावौ च कल्पितौ।
निष्काम: किं विजानाति किं ब्रूते च करोति किम्॥

आत्मा निश्चित  ब्रह्म  है,  मिथ्या  भाव-अभाव।
फिर क्या जाने, क्या कहे,  कर निष्काम स्वभाव     ॥18-8॥

 

अष्टावक्र महागीता 19

जनक उवाच

तत्त्वविज्ञानसन्दंश   –  मादाय     हृदयोदरात्।
नानाविधपरामर्श  –  शल्योद्धार:  कृतो   मया ॥

तत्व  ज्ञान की है चिमटी,  मन में शूल हज़ार ।
अन्तरमन बस छाँट लो,  कर दी भूल  सुधार ॥19-1॥

क्व धर्म: क्व च वा काम: क्व चार्थ: क्व विवेकिता।
क्व द्वैतं क्व च वाऽद्वैतं  स्वमहिम्नि  स्थितस्य मे ॥

क्या धर्म, क्या  काम है,  अर्थ विवेक न सार ।
द्वैत-अद्वैत है क्या यहाँ,  स्थित स्वयश आकार॥19-2॥

क्व भूतं क्व  भविष्यद्  वा  वर्तमानमपि क्व  वा   ।
क्व देश: क्व च वा नित्यं स्वमहिम्नि स्थितस्य मे ॥

क्या भविष्य क्या भ्ाूत है,  वर्तमान क्या  भान ।
क्या देश क्या काल यहाँ, निज  महिमा में  जान ॥19-3॥

क्व चात्मा क्व च वानात्मा क्व शुभं क्वाशुभं तथा।
क्व चिन्ता क्व च  वाचिन्ता  स्वमहिम्नि  स्थितस्य मे॥

क्या आत्मा क्या अनात्मा, शुभ या अशुभ समान।
क्या चिंता क्या है नहीं,  निज महिमा में  जान॥19-4॥

क्व  स्वप्न:  क्व सुषुप्तिर्वा  क्व च जागरणं तथा ।
क्व  तुरियं भयं  वापि  स्वमहिम्नि  स्थितस्य मे॥

क्या स्वप्न, क्या निद्रा है,  जागे  एक  समान।
भय है क्या, क्या श्ाून्य है, निज महिमा में  जान ॥19-5॥

क्व  दूरं  क्व  समीपं वा बाह्यं क्वाभ्यन्तरं क्व वा।
क्व स्थूलं क्व च वा सूक्ष्मं स्वमहिम्नि स्थितस्य मे  ॥

क्या  दूर  क्या  पास है,  भीतर बाह्य समान ।
क्या छोटा, क्या है बड़ा,  निज महिमा में  जान॥19-6॥

क्व मृत्युर्जीवितं वा क्व लोका:  क्वास्य क्व लौकिकं  ।
क्व  लय: क्व समाधिर्वा  स्वमहिम्नि स्थितस्य मे  ॥

जन्म मृत्यु आखिर है क्या, लोक-अलोक समान ।
लय है क्या, समाधि क्या,   निज महिमा में जान ॥19-7॥

अलं    त्रिवर्गकथया   योगस्य    कथयाप्यलं।
अलं   विज्ञानकथया   विश्रान्तस्य   ममात्मनि॥

तीन  उद्देश्य  निर्रथक  है,  योग कथा बेकार ।
अर्थहीन  विज्ञान  कथन,  स्थित आत्म विचार ॥19-8॥

 

अष्टावक्र महागीता 20

जनक उवाच

क्व भूतानि क्व देहो  वा क्वेन्द्रियाणि क्व वा मन:।
क्व  शून्यं क्व  च  नैराश्यं  मत्स्वरूपे  निरंजने॥

पंचभूत  या  तन  कहाँ,  मन इन्द्रि नहीं भान।
नहीं  निराश  शून्य  कहाँ,  मै निर्दोष सुजान ॥20-1॥

क्व  शास्त्रं  क्वात्मविज्ञानं  क्व  वा निर्विषयं मन:।
क्व  तृप्ति:  क्व  वितृष्णत्वं  गतद्वन्द्वस्य मे सदा ॥

आत्मज्ञान क्या, शास्त्र क्या, विषयरहित ना भान।
क्या तृष्णा, या तृप्ति क्या,  सदा द्वन्द बिन मान   ॥20-2॥

क्व विद्या क्व च  वाविद्या क्वाहं  क्वेदं मम क्व वा ।
क्व बन्ध क्व च वा  मोक्ष:  स्वरूपस्य क्व रूपिता॥

क्या  विद्या,  अविद्या  क्या,  मेरा-तेरा  भान।
क्या  बंधन,  क्या मोक्ष भी,  सदा एक रूप जान॥20-3॥

क्व  प्रारब्धानि  कर्माणि  जीवन्मुक्तिरपि क्व वा।
क्व  तद्   विदेहकैवल्यं   निर्विशेषस्य   सर्वदा॥

क्या है ये प्रारब्ध कर्म, क्या जीवन मुक्ति  ज्ञान।
सदा  विशेषण  तन रहित, क्या मोक्ष पहचान ॥20-4॥

क्व कर्ता क्व च वा भोक्ता  निष्क्रियं स्फुरणं क्व वा ।
क्वापरोक्षं  फलं  वा क्व  नि:स्वभावस्य मे सदा॥

क्या  है  कर्ता  भोक्ता,  जड़-चेतन सम मान ।
क्रियाशीलता निष्क्रियता, है स्वभाव बिन जान ॥20-5॥

क्व लोकं क्व मुमुक्षुर्वा क्व  योगी ज्ञानवान् क्व वा।
क्व  बद्ध:  क्व  च  वा मुक्त: स्वस्वरूपेऽहमद्वये॥

क्या  जगत  क्या मुक्तता,  योगी कौन सुजान।
बँधा कौन या मुक्त बता,  अद्वय मुझको मान॥20-6॥

क्व सृष्टि: क्व च संहार: क्व साध्यं क्व च साधनं ।
क्व  साधक:  क्व  सिद्धिर्वा   स्वस्वरूपेऽहमद्वये॥

क्या सृष्टि, संहार क्या,  साधन  साध्य समान ।
कौन है साधक, सिद्धि क्या, अद्वय मुझको  मान॥20-7॥

क्व  प्रमाता  प्रमाणं  वा  क्व प्रमेयं क्व च प्रमा ।
क्व किंचित् क्व न किंचिद्  वा सर्वदा विमलस्य मे॥

क्या ज्ञाता, क्या साक्ष्य है, क्या ज्ञेय, क्या ज्ञान ।
क्या अल्पतम क्या सकल,  सदा हूँ निर्मल जान॥20-8॥

क्व  विक्षेप: क्व चैकाग्र्यं  क्व निर्बोध: क्व  मूढता।
क्व हर्ष: क्व  विषादो वा  सर्वदा  निष्क्रियस्य मे॥

ध्यान  नहीं,  चैतन्य  रहूँ,  ज्ञानी-मूर्ख  समान।
क्या ख़ुशी, दुख भी नहीं,  सदा ही निष्क्रिय मान॥20-9॥

क्व  चैष  व्यवहारो  वा  क्व च  सा परमार्थता।
क्व  सुखं  क्व च वा  दुखं  निर्विमर्शस्य मे सदा॥

क्या  जग  यह मेरे लिये,  परमारथ ना काम ।
क्या है सुख-दुख में रखा, बिना विचार मुकाम ॥20-10॥

क्व माया क्व च संसार:  क्व प्रीतिर्विरति: क्व वा ।
क्व  जीव:  क्व  च  तद्ब्रह्म  सर्वदा विमलस्य मे  ॥

क्या  माया,  संसार  क्या,  राग-द्वेष  समान ।
क्या जीव क्या ब्रह्म है,  सदा  शुद्ध  मैं  मान॥20-11॥

क्व  प्रवृत्तिर्निर्वृत्तिर्वा  क्व  मुक्ति:  क्व  च बन्धनं ।
कूटस्थनिर्विभागस्य   स्वस्थस्य    मम   सर्वदा ॥

अनासक्ति-आसक्ति  क्या,  मुक्ति-बन्धन समान।
स्थित  रहूँ बँटता  नहीं, स्वस्थ  सदा  हूँ मान ॥20-12॥

क्वोपदेश: क्व वा शास्त्रं क्व  शिष्य: क्व च वा गुरु: ।
क्व चास्ति पुरुषार्थो  वा  निरुपाधे:  शिवस्य मे  ॥

शास्त्र  क्या  उपदेश  क्या, शिष्य-गुरु है कौन ।
पुरुषार्थ  योग्य  कुछ  नहीं,  शिवरूप हूँ मौन ॥20-13॥

क्व चास्ति क्व च वा नास्ति  के वास्ति चैकं क्व च द्वयं ।
बहुनात्र    किमुक्तेन   किंचिन्नोत्तिष्ठते    मम   ॥

क्या है और क्या  नहीं,  क्या  है  द्वैत-अद्वैत  ।
और  मैं  अब  क्या  कहूँ,  भाव नहीं है द्वैत  ॥20-14॥

Hemant Lodha

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